जवाब: W alaykum assalam Sajid bhai, परमात्मा शब्द को कुछ हिंदू बहन भाई परमेश्वर के अर्थ में बोलते हैं जबकि परमेश्वर परमात्मा का स्वामी है। ख़ैर, वह बहन परमेश्वर अल्लाह या ख़ुदा या God को ऐसे क्यों याद करना चाहती है कि वह सब कुछ भूल जाए? क्या परमेश्वर अल्लाह ने अपने बंदों को ऐसा करने के लिए कहा है? नहीं। ...तो फिर उसे उस तरह याद करो जैसे कि वह चाहता है। वह चाहता है कि बंदा कायनात की हर चीज़ को, उनकी ख़ूबियों को, ख़ुद को और ख़ुद की ख़ूबियों को रब की निशानियाँ माने और उन पर, उनके मक़सद पर ध्यान दे। जिस तरह हर चीज़ काम करती है। उस पर ध्यान दे और हर चीज़ से उसे जो जो फ़ायदे उसे और सबको पहुंच रहे हैं, उन फायदों पर ध्यान दे ताकि बंदे के दिल में रब की नेमतों पर उसके शुक्र का जज़्बा पैदा हो। 🕋🌴🌴🌴 रब का मक़सद यह है कि बंदा अपने रब का शुक्रगुज़ार हो और वह ख़ुद को रब के रंग में रंगे कि जैसे रब सबको फ़ायदा पहुंचा रहा है, वैसे ही मैं भी अपनी ताक़त के मुताबिक़ सबको फ़ायदा पहुंचाऊँ। 🌷🌷🌷🌷🌷 शुक्र दिल की एक भावना है। जब एक बंदा शुक्र से भर जाता है तो उसे ज़ाहिर करने के लिए उसे बोल की ज़रू...
Part 1 आचार्य मौलाना शम्स नवेद उस्मानी रहमतुल्लाहि अलैह ने अपनी बुक में वेद, बाइबिल और क़ुरआन के समान सूत्र (कलिमा ए सवा) से सिखाया है धार्मिक सद्-भावना बढ़ाना। अब हम बेरोजगारों और ग़रीबों को वेद, बाइबिल और क़ुरआन के समान सूत्र (कलिमा ए सवा) से सिखाएंगे कमाना और दौलत बढ़ाना।। वेद, बाइबिल और क़ुरआन के समान सूत्र (कलिमा ए सवा) से रोज़ी कमाना एक नया और अनोखा आयडिया है, अल्हम्दुलिल्लाह! Part 2 आचार्य मौलाना शम्स नवेद उस्मानी रहमतुल्लाहि अलैह ने जब WORK के दाईयों की रोज़ी रोटी के बारे में विचार किया तो उन्होंने खेती को पसंद किया। उन्हें ऐसा कोई आदमी नहीं मिला जो इतनी ज़मीन मिशन को दान करता और किसी ने ज़मीन दी भी नहीं। सो वर्क का हरेक कल्याणकारी कार्यकर्ता अपनी रोज़ी रोटी का इंतेज़ाम ख़ुद करता था। मौलाना का विचार यह था कि वेद, बाइबिल और क़ुरआन के समान सूत्र (समान मंत्र, कलिमा ए सवा) को सब धर्म के लोगों के सामने लाया जाए ताकि उनमें आपसी सद्भाव बढ़े और भारत विश्वगुरू बने। मैं 30 साल तक भारत को विश्वगुरू बनाने के लिए विभिन्न माध्यमों से विश्व भर को समान सूत्र पर लेक्चर और उपदेश देता रहा। ...
इस्लाम का अर्थ क्या है? अब आदमियों को इतना समझदार हो जाना चाहिए कि वे यह बात समझ लें कि अलग-अलग भाषाओं के लोग अपनी-अपनी भाषाओं में एक ही रचयिता परमेश्वर का नाम लेंगे तो वे नाम उनकी भाषाओं में ही होंगे और इसीलिए वे अलग नाम होंगे। यह किसी तरह उचित नहीं है कि यह कहा जाए कि मेरा परमेश्वर तेरे 'इक ओंकार' से, तेरे रब से या तेरे गॉड से बड़ा है क्योंकि सबका रचयिता एक ही है। ऐसे ही संस्कृत भाषा के शब्द 'धर्म' को अरबी भाषा में धर्म नहीं कहा जा सकता और अरबी शब्द दीन को संस्कृत में दीन नहीं कह सकते क्योंकि दोनों भाषाओं में अलग-अलग शब्द होना स्वाभाविक है। यह समझ में आने वाली बात है कि संस्कृत शब्द #समर्पण का अरबी में अनुवाद #इस्लाम हो और मनुष्य का एकमात्र धर्म अपने रचयिता परमेश्वर के सामने अपना और अपनी इच्छाओं का समर्पण करना ही है। फिर दोबारा समझ लें कि अगर यह बात सही और सच है तो समर्पण को ही अरबी में इस्लाम कहते हैं। इसी बात को उर्दू में कहेंगे तो यह बात ग़लत नहीं हो जाती कि 'अपने रब के सामने ख़ुद को और अपनी ख़्वाहिशात को 'सुपुर्द करना' ही इंसान का फ़र्ज़ है...
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